झींगा के वाइब्रिओसिस रोग की रोकथाम

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Authors

  • e-Patrika Admin केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (इम्पफाल) लेम्बुचेरा-799210 (त्रिपुरा)
  • नयन चैहान केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (इम्पफाल) लेम्बुचेरा-799210 (त्रिपुरा)
  • अनिल एस. पावसे केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (इम्पफाल) लेम्बुचेरा-799210 (त्रिपुरा)
  • गजानन एस. गोडे केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (इम्पफाल) लेम्बुचेरा-799210 (त्रिपुरा)

Abstract

संपूर्ण विश्व की प्रोटीन मांग को पूरा करने में जलीय कृषि का अहम् योगदान रहा है। भविष्य में यह मांग और बढ़ने की उम्मीद है। इस बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिए विश्वभर में जलजीव पालन में गहन तकनीक के इस्तेमाल पर जोर दिया है। इससे जलीय कृषि का उत्पादन बढ़ रहा है। परन्तु गहन तकनीक के उपयोग से जलीय कृषि में विभिन्न चुनौतियों का सामना किसानों व पर्यावरण को करना पड़ रहा है, जैसे कि जैव विविधता का नुकसान, पोषक तत्वों का प्रदूषण, जलजीवों में रोग की आशंका बढ़ना आदि। इसी जलीय कृषि में झींगापालन का बहुत बड़ा योगदान है। भारत से झींगा को विश्व के कई देशों में निर्यात किया जा रहा है। झींगापालन में विभिन्न रोगों जैसे कि जीवाणु, विषाणु, कवक और परजीवी द्वारा होने वाली हानि से इसके पालन में कठिनाइयों का सामना किसानों को करना पड़ता है।

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Published

2024-04-03

How to Cite

e-Patrika Admin, नयन चैहान, अनिल एस. पावसे, & गजानन एस. गोडे. (2024). झींगा के वाइब्रिओसिस रोग की रोकथाम. खेती, 76(10), 13-14. https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/780