तटीय जलभराव क्षेत्रों के लिए जलवायु अनुकूल कृषि प्रौद्योगिकियां

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Authors

  • एस.के. राउतराय भाकृअनुप-भारतीय जल प्रबंधन संस्थान, भुबनेश्वर (ओडिशा)
  • अर्जमादत्त षड़ंगी भाकृअनुप-भारतीय जल प्रबंधन संस्थान, भुबनेश्वर (ओडिशा)
  • आर.के. मोहंती भाकृअनुप-भारतीय जल प्रबंधन संस्थान, भुबनेश्वर (ओडिशा)
  • एस. मोहंती भाकृअनुप-भारतीय जल प्रबंधन संस्थान, भुबनेश्वर (ओडिशा)
  • ओ.पी. वर्मा भाकृअनुप-भारतीय जल प्रबंधन संस्थान, भुबनेश्वर (ओडिशा)

Abstract

ओडिशा राज्य के तटीय क्षेत्रों में दक्षिण-पश्चिमी मानसून ;जून-सितंबरद्ध के कारण अधिक वर्षा (औसत 1500 मि.मी.) होती है। इन क्षेत्रों की कृषि योग्य भूमि तश्तरी के आकार में होती है। इन क्षेत्रों में खराब जल निकासी की स्थिति के कारण जलभराव और बाढ़ की स्थिति बन जाती है। इससे इन क्षेत्रों का कुछ भाग लगभग 5 से 6 महीनों (जुलाई-नवंबर) तक जलमग्न रहता है और भूमि में जल की गहराई 0.50 से 2 मीटर तक रहती है। जलभराव की स्थिति के कारण इन बाढ़ संभावित क्षेत्रों में सामान्य धान का उत्पादन (1 टन/हैक्टर से भी कम) बहुत कम प्राप्त होता है। अचानक भूमि जलस्तर में बृद्धि के कारण समूची फसल का नुकसान हो जाता है। दूसरी ओर सर्दियों एवं गर्मियों के मौसम में अनियमित वर्षा या बहुत ही कम वर्षा होती है। इसलिए, दिसंबर के बाद इन क्षेत्रों की कृषि योग्य भूमि सूखी पड़ जाती है। इस कारण मृदा में उपलब्ध नमी किसी भी पफसल के वाष्पीकरण-वाष्पोत्सर्जन के नुकसान को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं रह पाती है। इस वजह से कोई भी पफसल बिना सिंचाई के नहीं उगाई जा सकती है। इन क्षेत्रों की मृदा में लवणता की समस्या भी रहती है। भूजल लवणीय होने के कारण कृषि के लिए उपयोगी नहीं होता है। इन सभी समस्याओं के अलावा, मई-जून और अक्टूबर-नवंबर में चक्रवात आने का खतरा रहता है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन के हानिकारक प्रभावों के कारण यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। इन्हीं समस्याओं के कारण ओडिशा राज्य के तटीय जलभराव वाले क्षेत्रा जलवायु परिवर्तन की घटनाओं से अधिक प्रभावित होते रहते हैं।

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Published

2024-03-28

How to Cite

एस.के. राउतराय, अर्जमादत्त षड़ंगी, आर.के. मोहंती, एस. मोहंती, & ओ.पी. वर्मा. (2024). तटीय जलभराव क्षेत्रों के लिए जलवायु अनुकूल कृषि प्रौद्योगिकियां. खेती, 76(8), 27-30. https://epatrika.icar.org.in/index.php/kheti/article/view/943