कृषि परिवेश में जैविक प्रमाणीकरण
122 / 138Abstract
पिछले 10-15 वर्षों से यह सि( हो चुका है, कि जैविक खेती, विशेषकर सीमांत और छोटे किसानों को, आर्थिक और सामाजिक लाभ पहुंचा रही है। खाद्य एवं कृषि संगठन (एपफए.ओ) के आंकड़ों के अनुसार कई विकासशील देशों (जिसमें भारत भी शामिल है) का बहुत सा कृषि क्षेत्रा आज भी परंपरागत खेती पर ही निर्भर है और यह रासायनिक पदार्थों से मुक्त है। ऐसे क्षेत्रों को जैविक खेती के लिये उपयोग में लाना और उनके उत्पादों का विपणन करना जरूरी है। इसके लिये जैविक उत्पादों की गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिये जैविक प्रमाणीकरण की आवश्यकता होती है। आज का उपभोक्ता अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति जागरूक है। वह स्वयं व अपने परिवार को पोषक भोजन देना चाहता है। इसलिये वह जैविक उत्पादों के लिये अच्छे दाम भी देने के लिये तैयार है। बस जरूरत है, तो सही जैविक प्रमाणीकरण की। यह इसलिए कि जैविक किसानों और उपभोक्ताओं के बीच विश्वास बना रहे। जैविक
प्रमाणीकरण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत मान्यता प्राप्त जैविक प्रमाणीकरण संस्थाओं द्वारा जैविक उत्पादन की विभिन्न अवस्थाओं जैसे-उत्पादन, प्रसंस्करण, भण्डारण आदि का राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय जैविक मानकों के आधार पर निरीक्षण किया जाता है। इसके उपरांत किसानों को ‘प्रमाणित जैविक खेती/उत्पाद’ का प्रमाण पत्रा दिया जाता है। जैविक उत्पाद उगाने वाला किसान ‘प्रमाणित जैविक उत्पादक किसान’ कहलाता है।
Downloads
Downloads
Published
Issue
Section
License
Copyright (c) 2024 खेती

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License.
खेती में प्रकाशित लेखों का कॉपीराइट भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पास निहित है, जिसे भारत या विदेश में किसी भी संगठन के साथ किसी भी समझौते में प्रवेश करने का अधिकार है, जो रिप्रोग्राफी, फोटोकॉपी, भंडारण और सूचना के प्रसार में शामिल है। इन पत्रिकाओं में सामग्री का उपयोग करने में परिषद को कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते जानकारी का उपयोग अकादमिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो, लेकिन व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं। आईसीएआर को देय क्रेडिट लाइन दी जानी चाहिए जहां सूचना का उपयोग किया जाएगा।