मछलीपालन में एंटीबायोटिक्स का प्रभाव
85 / 37Abstract
मानव सभ्यता सीधे तौर पर पर्यावरण में मौजूद एंटीबायोटिक अवशेषों से जुड़ी हुई है। ये अवशेष पर्यावरण में प्राकृतिक रूप से या कृत्रिम रूप से उत्पन्न होते हैं। इनसे बचने और प्रतिकार के लिए इन अवशेषों की वातावरण में भूमिका एवं मिलावट को बेहतर रूप से समझने की आवश्यकता है। जलीय कृषि उद्योग के तेजी से विकास और महत्व को ध्यान में रखते हुए, एंटीबायोटिक दवाओं के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए अतिरिक्त प्रयास किए जाने की जरूरत है। मछलीपालन करने वाले किसानों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि मछलियों को स्वास्थ्य और कल्याण की सर्वोत्तम स्थिति में रखा जाए। नई दवाओं के आविष्कार या एंटीबायोटिक के विकल्प के उपयोग को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। इस प्रकार बढ़ी हुई जागरूकता, किसानों के जीवन स्तर के उत्थान को सुनिश्चित करके जलीय वातावरण की बेहतरी में मदद कर सकती है।
Downloads
Downloads
Published
Issue
Section
License
Copyright (c) 2024 खेती

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License.
खेती में प्रकाशित लेखों का कॉपीराइट भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पास निहित है, जिसे भारत या विदेश में किसी भी संगठन के साथ किसी भी समझौते में प्रवेश करने का अधिकार है, जो रिप्रोग्राफी, फोटोकॉपी, भंडारण और सूचना के प्रसार में शामिल है। इन पत्रिकाओं में सामग्री का उपयोग करने में परिषद को कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते जानकारी का उपयोग अकादमिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो, लेकिन व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं। आईसीएआर को देय क्रेडिट लाइन दी जानी चाहिए जहां सूचना का उपयोग किया जाएगा।