धान में सूत्रकृमियों का प्रबंधन
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आर्थिक नुकसान, पौधा-परजीवी सूत्रकृमि प्रजातियाँ, एकीकृत सूत्रकृमि प्रबंधन रणनीतिAbstract
धान की फसल में विभिन्न प्रकार के सूत्रकृमि पाए जाते हैं, जो पौधे के अलग-अलग हिस्सों को संक्रमित करके उत्पादन और गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। पत्ती और तना को प्रभावित करने वाले सूत्रकृमि जैसे सफेद शीर्ष/सिरा सूत्रकृमि (एफ़ेलेनचोइड्स बेसेई) और तना सूत्रकृमि (डाइटिलेंकस एंगस्टस) पौधों की पत्तियों और तनों में संक्रमण करते हैं, जिससे पत्तियाँ पीली हो जाती हैं, तना कमजोर होता है और पौधे झाड़ी जैसे दिखाई देते हैं। इसके विपरीत, जड़ को प्रभावित करने वाले सूत्रकृमि जैसे जड़-गाँठ सूत्रकृमि (मेलोइडोगाइन ग्रैमिनिकोला, जड़ सूत्रकृमि (हिर्शमैनिएला प्रजातियाँ), पुटी सूत्रकृमि (हेटेरोडेरा ओरिज़िकोला), हैं, जिससे पौधे की वृद्धि और पोषक तत्वों के अवशोषण को प्रभावित करते है। इन सूत्रकृमि के प्रभाव को कम करने के लिए प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना, फसल चक्र अपनाना, गर्म पानी से बीज उपचार करना, जैविक और रासायनिक नियंत्रण उपाय, गहरी जुताई और सहफसली खेती (इंटरक्रॉपिंग) जैसी रणनीतियाँ अपनाई जाती हैं। यह लेख इस समस्या, इसके लक्षणों, नियंत्रण उपायों तथा भारत की विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों और कृषि प्रणालियों के अनुरूप विकसित समग्र एकीकृत सूत्रकृमि प्रबंधन रणनीति का व्यापक अवलोकन प्रस्तुत करता है।
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