धान-गेहूं फसलचक्र में अवशेषों का प्रबंधन
99 / 66Abstract
किसी भी फसल को सफलतापूर्वक उगाने के लिए बहुत से प्राकृतिक घटकों की आवश्यकता होती है। इनमें मृदा, पानी, वर्षा और मौसम प्रमुख हैं। अच्छी फसल लेने के साथ-साथ मृदा, पानी, पर्यावरण का संरक्षण करना भी जरूरी है। उत्तर-पूर्वी हरियाणा में धान-गेहूं एक मुख्य फसलचक्र है। यहां पर पानी, मृदा और पर्यावरण से संबंधित समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। भूमिगत जलस्तर लगातार नीचे जा रहा है। मृदा में पोषक तत्व तथा जैविक कार्बन की मात्रा घटने से उपजाऊ क्षमता घट रही है। फसल अवशेष जलाने के कारण पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के कारण ग्लोबल वार्मिंग हो रही है। इसके अलावा मौसम की अनिश्चितता भी बढ़ती जा रही है।
Downloads
Downloads
Published
Issue
Section
License
Copyright (c) 2023 खेती

This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License.
खेती में प्रकाशित लेखों का कॉपीराइट भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पास निहित है, जिसे भारत या विदेश में किसी भी संगठन के साथ किसी भी समझौते में प्रवेश करने का अधिकार है, जो रिप्रोग्राफी, फोटोकॉपी, भंडारण और सूचना के प्रसार में शामिल है। इन पत्रिकाओं में सामग्री का उपयोग करने में परिषद को कोई आपत्ति नहीं है, बशर्ते जानकारी का उपयोग अकादमिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो, लेकिन व्यावसायिक उपयोग के लिए नहीं। आईसीएआर को देय क्रेडिट लाइन दी जानी चाहिए जहां सूचना का उपयोग किया जाएगा।