लैवेंडर उत्पादन से भरपूर संभावनाएँ

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Authors

  • बनारसीलाल मुख्य वैज्ञानिक एवं प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र, रियासी
  • हेमा त्रिपाठी सह निदेशक (विस्तार), शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय-जम्मू
  • अमरीश वैद्य निदेशक (विस्तार), शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय-जम्मू
  • ए.एस. चरक प्रधान वैज्ञानिक एवं प्रमुख, कृषि विज्ञान केंद्र, डोडा
  • भूपेंद्र नाथ त्रिपाठी कुलपति, शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय-जम्मू

Abstract

भारत, औषधीय एवं सुगंधित पौधें की समृद्ध जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है। बदलते कृषि परिदृश्य में, जहाँ कृषि विविधिकरण तथा उच्च मूल्य वाली फसलों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है, वहीं लैवेंडर एक महत्वपूर्ण सुगंधित एवं औषधीय फसल के रूप में उभरकर सामने आया है। इसके पुष्पों से प्राप्त आवश्यक तेल का उपयोग इत्र, सौंदर्य प्रसाधन, अरोमाथेरेपी, औषधीय उत्पादों तथा वेलनेस उद्योग में व्यापक रूप से किया जाता है, जिसके कारण इसकी घरेलू और वैश्विक मांग निरंतर बढ़ रही है। भारत सरकार द्वारा वर्ष 2016 में प्रारंभ किए गए अरोमा मिशन तथा पर्पल रिवोल्यूशन ने लैवेंडर की व्यावसायिक खेती को नई पहचान दी है। इन पहलों का उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित करना तथा सुगंध एवं आवश्यक तेल उद्योग को प्रोत्साहित करना है। कम लागत, अपेक्षाकृत सरल प्रबंधन और मूल्य संवर्धन की बेहतर संभावनाओं के कारण यह पफसल किसानों के लिए एक लाभकारी विकल्प बन रही है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के उच्च पर्वतीय क्षेत्रा लैवेंडर की खेती के लिए विशेष रूप से उपयुक्त हैं। इन क्षेत्रों की अनुकूल जलवायु और मृदा में इसकी सफल खेती के साथ आवश्यक तेल का उत्पादन कर किसानों को बेहतर आर्थिक लाभ प्राप्त हो रहा है। बढ़ती बाजार मांग और सरकारी प्रोत्साहन को देखते हुए लैवेंडर की खेती पर्वतीय क्षेत्रों में आय बढ़ाने, कृषि विविधीकरण और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने का एक प्रभावी माध्यम बनकर उभर रही है।

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Published

2026-09-25

How to Cite

बनारसीलाल, हेमा त्रिपाठी, अमरीश वैद्य, ए.एस. चरक, & भूपेंद्र नाथ त्रिपाठी. (2026). लैवेंडर उत्पादन से भरपूर संभावनाएँ. फल फूल, 47(5), 38-40. https://epatrika.icar.org.in/index.php/phalphool/article/view/2333